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Krodh

Poem on Anger - From Mokshamarg Prakashak Pravachan क्रोड़ कर मार अउ मरै ताहि फांसि होय किंचित हु मारे तोहु जेइ जेल थाने मे जो कभू निबल भये हाथ पाव टुटे गे थोर थोर पटि बांधी पाडे सफखेन मे पिछे से कुटुम्बी है और करत फियरे जाय जाय पैर पडे तहसील और थाने मे किंचित किय क्रोध एते दुखा होतो भाई होत है अनक गुन जरा गम खने में Reference - Mokshmarg Prakashak